कल एक बड़ा अच्छा अवसर मिला । ये अवसर था “दिल्ली ब्लॉगर्स मीट” में शामिल होने का । और इसका पूरा श्रेय जाता है भाई अजय कुमार झा को, जिन्होंने न सिर्फ़ दिल्ली के बल्कि भारत के अन्य शहरों तथा विदेशों में बसे हुए कई हिन्दी ब्लॉगर्स को एक मेज़ पर लाने का बेहद ज़िम्मेदारी वाला काम किया । मेरे लिये ये पहला मौक़ा था कि ब्लॉगर्स से मैं फ़ेस-टु-फ़ेस मिला । कल मुझे प्रगति मैदान भी जाना था, क्योंकि वर्ल्ड बुक फ़ेयर का कल समापन था और मैं इस साल अभी तक जा नहीं सका था । इसीलिये ब्लॉगर भाइयों से माफ़ी चाह कर मीटिंग के बीच में ही उठ गया । अब जब भाइयों के ब्लॉग्ज़ पढ़ रहा हूं, तो लग रहा है कि काफ़ी कुछ मिस कर गया, क्योंकि बाद में और भी ब्लॉगर्ज़ आए । उनसे मुलाक़ात न हो सकी । बहरहाल । अगली बार सही । भाई अजय कुमार झा को धन्यवाद कि उन्होंने मुझे इस मीट में आमन्त्रित किया । उमीद है कि अगली मीट्स में भी ब्लॉगर फ़्रेंड्स मुझे बुलायेंगे । अजय जी थैंक्स वन्स अगेन ।
ISHQIYA – एक “सल्फ़ेट” टायटिल वाली “महा-सल्फ़ेट” फ़िल्म
आज “इश्क़िया” जैसी “सल्फ़ेट” फ़िल्म झेलने का अवसर मिला । महा-बकवास, महा-बोर, महा-सल्फ़ेट फ़िल्म है ये । पता नहीं ’विशाल भारद्वाज एंड कम्पनी’ हिन्दुस्तानी कल्चर को बर्बाद करने में सबसे आगे क्यों रहना चाहती है । ’ओमकारा, कमीने, इश्क़िया’ जैसी फ़िल्मों में खुली-खुली गालियां इस्तेमाल करके नई नस्ल को “आधुनिक” बनाने की “सल्फ़ेट” हरकत नाक़ाबिल-ए-माफ़ी है । नसीरुद्दीन शाह जैसे महान ऎक्टर ने भी पता नहीं क्यों की ये फ़िल्म । कुल मिला कर ये एक वाहियात फ़िल्म है । हाल से बाहर निकलते वक़्त ख़ुद पर ग़ुस्सा आता है कि आख़िर हम क्यों आये थे यहां ’सल्फ़ेट’ बनने । इसका तो टायटिल भी बेतुका है ।
हू आर यू? व्हाट आर यू ?
हमारा इकसठवां गणतंत्र-दिवस आ गया है. हम फिर वही सब करेंगे… देशभक्ति-गीत सुनना-सुनाना, झंडा फहराना, परेड देखना, छुट्टी मनाना…. वग़ैरा-वग़ैरा-वग़ैरा…! मेरे जैसे लोग एक-दूसरे को बधाई के एस एम एस भी भेज देंगे…! बस्स… बात खतम…! और इतने भर से हम अपने आप को देश-भक्त मान लेंगे ! “देश-भक्त”…!
हा…हा…हा……!!! हम अपने देशवासियों को कास्ट, रिलीजन, रीजन आदि के हिसाब से बांटते हैं, दबाके रिश्वत लेते-देते हैं, जमाख़ोरी करते हैं, अतिक्रमण करते हैं, मिलावट करते हैं, चोर-बज़ारी करते हैं, विदेशी माल को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से मंगाकर धड़ाधड़ बेचते हैं, ब्लैक-मार्किटिंग करते हैं, नक़ली दवाएं बनाते-बेचते हैं, पैसे के लालच में अंधे होकर किसी भी हद तक जाते हैं…… फिर भी हम “देशभक्त” हैं…”सच्चे भारतीय” हैं… भारतमाता के “सच्चे” सपूत हैं…..! अबे अक़ल के अंधो ! ये “देशभक्ति” नहीं, “देशद्रोह” है, “देशद्रोह”…. सेंट-परसेंट “देशद्रोह”… यानी “वतन से ग़द्दारी”…! और इस ग़द्दारी का कोई एक रूप नहीं है. अनेक रूप हैं. “देशभक्त” तो ईमानदार होता है. हम चाहे नौकरी करते हों, या बिज़निस. या कुछ और. ज़रा अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें. हम क्या हैं ? “भक्त” ? या…. “द्रोही” ? जय-हिन्द !
mujhko thhand lag rahi hai mujhse…
वाह-वाह ! क्या सर्दी है ! म्मज़ा आ गया…! कोहरा… सर्द हवाएं… कंपकंपी… गरम कपड़े…गरम पानी… ड्राय फ़्रूट्स… गाजर का हलवा… चाय-कॉफ़ी… लिहाफ़-रज़ाई… गीज़र-हीटर… मतलब फ़ुल ऐश…! समझ में नहीं आता कि “ग्लोबल वार्मिंग” से डरें या “हिम-युग” से ! वैसे आप इन दोनों में से किससे डरते हैं ? मेरी मानिये, किसी से भी मत डरिये. वो गाना सुना है ना? “खाओ-पियो ऐश करो मितरो… दिल किसी का दुखाओ ना….!” लिहाज़ा खुश रहिये और दूसरों को भी खुश रहने दीजिये….! अरे हां… अगर आपके पास पुराने गरम कपड़े हैं, तो उन्हें लेकर घर से बाहर निकल पड़िये, और दे दीजिये किसी ज़रूरतमन्द को…! सच मानिये, बड़ी दुआयें देगा वो आपको…! गुडनाइट !
सवाल
दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल की एक प्रायमरी क्लास में पढ़ने वाले मेरे पुत्र ने कल एक सवाल किया. उसने पूछा, “हमारे स्कूल में होली, दीवाली, राखी, क्रिसमस, लोहड़ी आदि सभी त्योहार मनाये जाते हैं. पर ईद नहीं मनाई जाती. क्यों ?” उसके इस सवाल पर मैंने उसे उस समय बहला दिया, पर इसका जवाब मेरे पास नहीं है. सोचता हूं उसकी प्रिंसिपल से यही सवाल पूछूं. पर क्या ये ठीक होगा ?
लोहड़ी दियां अडवांस लख-लख वधाइयां…!
ओये मितरो ! जाड़ा जा रहा है…! लोहड़ी आ गयी…. मूंगफली-रेवड़ी दा अरेंजमेंट कर लो ! कल रात विच तो तुसी भंगड़ा-शंगड़ा ते गिद्दा-शिद्दा पा के मस्त रहोगे ! इस वास्ते साड्डी तरफ़ से पेशगी मुबारकां अज ही क़ुबूल करो…! हैपी लोहड़ीईईईईईई…..!
जहांपनाह, तुसी ग्रेट हो…..
समझ में नहीं आता कि लोग मौसम से इतना परेशान क्यों हैं. यार, ये अन्डरस्टुड बात है कि दिसम्बर-जनवरी में ठन्ड नहीं पड़ेगी तो क्या गर्मी पडेगी ? और अगर खुदा-न-ख़्वास्ता इन महीनों में गर्मी पड़ भी गयी, तो भी भाई लोग बेताब हो जाएंगे. और कोसने लगेंगे ग्लोबल वार्मिंग को. भईया, मौसम को बुरा मत कहो. बल्कि तारीफ़ करो इस मौसम की. और इन्ज्वाय करो इसे. बदलते मौसम, सर्द-गर्म हवायें, बारिशें, तेज़ धूप…. ये सब तो क़ुदरत की सौग़ातें हैं. इनका लुत्फ़ उठाओ, और उस मालिक को थैंक्स कहो जो हम सब पर अपनी रहमत बरसाता है. उन गन्दे लोगों की तरह मत बनो, जो मौसम का मिज़ाज ज़रा सा बदल जाने पर कहने लगते हैं कि “कितना गन्दा मौसम है !” अबे मौसम गन्दा नहीं है, गन्दे तुम हो, जो नेगेटिव थिंकिंग रखते हो और हमेशा किलसते ही रहते हो. समझे महाराज ? तो फिर आज के बाद मत कहना, कि “उफ़्फ़…. मौसम ख़राब हो गया.” मौसम “ख़राब” नहीं होता. “बदलता” है. की समझे ज़िल्ले-सुबहानी ? की दसया ? सब सम्झ गए? ते फेर बैठे की हो कम्प्यूटर जी दे नाल ? जाओ किसी अच्छे से “सनीमा होल” में, और मिल आओ तीन “ईडियटों” से, जो आपसे कहेंगे…. “जहांपनाह, तुसी ग्रेट हो….. तोहफ़ा क़ुबूल करो !” होर अगर “सनीमा होल” नईं जा सकदे तो कोई गल्ल नईं… सीडी लाके ही वेख लो ! (ना…ना…ना…… मैं उनका प्रचार नहीं कर रहा. मैं तो ये कहना चाह रहा हूं, कि इस हाड़ कंपाती सर्दी में ढेर सारे कपड़े पहनकर निकल पड़ो पैदल. और मज़ा उठाओ इस ख़ूबसूरत जाडे़ का. क्योंकि जल्दी ही सर्दी कम होने वाली है. क्या कहा? मुझे कैसे पता? अच्छा ठीक है. कल ही देख लेना. कम से कम दिल्ली वाले तो सन्डे तक मौसम का बदला हुआ मिज़ाज देख ही लेंगे. क्योंकि…… क्योंकि ये बात ’विचित्र किन्तु सत्य’ है…. कि “दिल्ली में मौसम का मिज़ाज अक्सर वीक-एन्ड पर ही बदलता है.”) जय-हिन्द !
hApPy tWeNtY-tEn !
नये साल के नये इरादे,
नई हैं कसमें, नये हैं वादे !
लेकिन अपनी दुआ वही है,
सबको रब्बा लिफ़्ट करा दे !!
थोडी सी तो लिफ़्ट करा दे !!!
हैपी न्यू ईयर in advance…!!!!!

